मेरा काट कलेजा दिल्ली, मुई दिल्ली ले गई

दिल्ली में किसकी सरकार बनेगी? क्या आम आदमी पार्टी चुनाव जीत जाएगी? या फिर बीजेपी कुछ कमाल दिखाएगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस ही कुछ उलटफेर कर दे? सब राजनीति है. किसको क्या पता कि क्या होने वाला है. लेकिन एक बात जरूर पता है और वो ये कि दिल्ली वैसी ही रहेगी जैसी रही है. कभी स्याह, कभी सफेद. कभी महिलाओं के लिए असुरक्षित होने का इल्जाम झेलेगी, कभी अपराध के लिए बदनामी झेलेगी, कभी प्रदूषण, कभी कूड़े के पहाड़ तो कभी खत्म होती यमुना के लिए चर्चा में आएगी. चुनाव के नतीजे चाहे जो हों लेकिन दिल्ली बदल जाएगी ऐसा लगता तो नहीं है.

वैसे सपनों का शहर रहा है दिल्ली. दिल्ली जीतने का मतलब होता है देश जीत लेना. कालखंड चाहे जो रहा हो. दिल्ली का सच यही रहा है. दूर दूर से लोग यहां आते हैं. यहीं के होकर रह जाते हैं और दिल्ली सभी को अपनी बाहों में समेट लेती है. सभी को जगह देती है. बहुत सारे लोगों के सपने पूरे होते हैं तो कईयों के सपने टूट भी जाते हैं. दिल्ली गवाह बनती है लाखों सपनों के पूरा होने और टूट जाने की. जीते हुए लोगों के साथ हंसती है दिल्ली और हारे हुए लोगों के साथ रोती है दिल्ली. लेकिन दिल्ली किसी को अकेला नहीं छोड़ती.

श्रीनिवासपुरी की गलियों से लेकर संतनगर की गलियों तक और सीलमपुर से लेकर नरेला तक दिल्ली के हजार रूप देखने को मिलते हैं. यहां आपको चाय की दुकानों पर गांजे की पुड़िया मिल सकती है. शराब के ठेकों पर देर रात को शराब मिल सकती है. हो सकता है कि कोई कॉल गर्ल अचानक आपके हाथ में विजिटिंग कार्ड पकड़ा जाए. स्पा सेंटर पर चेकिंग में कुछ गैरकानूनी मिल जाए. हो सकता है कि कोई आपको आईफोन बोलकर साबुन की टिक्की थमा दे, हो सकता है कैंसर पीड़ितों के नाम पर कोई ठग ले जाए. दिल्ली में कुछ भी हो सकता है.

काश कोई सरकार ऐसी होती जो जीबी रोड़ वाली लड़कियों की सुध लेती. कोई सरकार ऐसी भी होती जो फुटपाथ पर सोने वालों के सर पर छत दे देती. काश कोई सरकार यमुना को जिंदगी देने की सोचती. काश कोई सरकार ऐसी भी होती जो दूर दराज से आए छात्रों को सुरक्षित महसूस कराती. काश कोई सरकार किराएदारों के दर्द को महसूस कर पाती. कोई सरकार तो होती जो सड़कों पर लगने वाले जाम से मुक्ति दिला पाती. लेकिन सरकार तक जनता की आवाज पहुंच नहीं पाती. जनता के दुख दर्द तकलीफें वैसे भी 5 साल में एक बार ही नजर आते हैं.

समस्याएं कई हैं लेकिन समाधान किसी सरकार, किसी सिस्टम के पास नहीं दिखता. चाहे जितने फ्लाईओवर बन जाएं, कितनी भी मेट्रो चल जाएं, दिल्ली का चाहे जितना विकास हो जाए और ऊपर से दिल्ली चाहे जितनी बदल जाए लेकिन सच्चाई ये है कि दिल्ली शायद ही कभी बदल पाए. शायद ही कोई सरकार हो जो दिल्ली को बदल सके.  दिल्ली सिर्फ कहने के लिए ही शहर है, कहने के लिए ही राज्य है. सच्चाई तो ये है कि दिल्ली अपने आप में पूरा हिन्दुस्तान है. काश कभी सरकारों को सच दिखाई दे और काश कभी दिल्ली बदले.

दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा है उस ने लूटा है

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